जो अपना गम छुपाओगे…

कुछ कमजोर लम्हों में जिंदगी अपना रुख बदलती है… हां शायद जज्बातों की मजबूती उस रुख को अपनी ओर कर पाने का माद्दा रखती है लेकिन मैं उस वक्त अपने जज्बातों को बांधकर रख पाने में उतनी मजबूत नहीं थी शायद जितना उस तूफान को को तबाही मचाने से रोकने के लिए होना चाहिए था. "हर खूबसूरत मंजर खूबसूरत नहीं होता… कि तूफान से पहले की शांति को सुकून के पल समझना बेवकूफी है…" पर शायद जज्बाती पलों में भावुकता का आवेग कुछ ऐसा होता है कि उसमें बह जाना ही जीने की खूबसूरती लगने लगती है. शायद इसी को इंसान कहते हैं और शायद इसी को जीतने वाला दुनिया का सबसे सुखी इंसान है जो शायद ही कहीं, दुनिया के किसी कोने में होगा… मैं भी उन आम इंसानों से अलग नहीं थी..यह उसी दिन मुझे एहसास हुआ..और फिर एक खूबसूरत दुनिया की तस्वीर बनाती चली गई. पर तस्वीरों का अक्सर वास्तविकता से कोई वास्ता नहीं होता… जाने कैसे भूल गई यह.. और फिर वही हुआ जो हो सकता था…

“जो अपना दर्द छुपाओगे तो मुझपर क्या लुटाओगे, खुशियां तो बहुत देते हैं, तुम दर्द भी नहीं दे पाओगे”… इन्हीं शब्दों ने मेरी तन्हाइयों की दुनिया की नई तस्वीर खींच दी.. अपनी तन्हाइयों में सेंध लगाने की किसी को आजादी नहीं दी थी अब तक लेकिन इन कुछ शब्दों ने जाने कैसा समां बांधा था कि अपनी उस अजीज तन्हाई से पार पाने को आतुर हो चली थी.. भावुकता में बहती चली गई…. अपनी वीरानियों के रास्ते खोल दिए किसी खूबसूरत गुलिस्तां की ओर मुड़ जाने को… जाने उस एहसास में कौन सी कशिश थी कि मैं बढ़ती चली गई उस नए तूफानी रास्ते की ओर जिसे अपनी जिंदगी का परीस्तान समझ बैठी थी कुछ लम्हों के लिए…

दर्द वह बीमारी है जिसकी दवा भी दर्द ही होती है… यह बात और है दोस्तों कि यही दवा आपके शरीरी गुलिस्तां में हजार ऐब पैदा कर जाता है… पर वह ऐब कहां ढूंढ़ पाते हैं हम.. देखते रहते हैं खूबियां और वह हमें खोखला कर जाती है… जब पता चलता है बहुत देर हो चुकी होती है… खलिश आ चुकी है जिंदगी में और इस खलिश को हलाल करने की दवा नहीं होती… पीठ में खंजर घोंपना इसी को कहते हैं शायद… पर उस खंजर को निकाल पाना आसान नहीं होता… ”दोस्त बनकर दुश्मनी कुछ ऐसी निभाई कि किसी से दोस्ती कबूल करने की आदत छोड़ दी है अब तो…” जिसके लिए पहली बार अपनी तन्हाइयों से नाता तोड़ दिया.. जिसके लिए जीने की इच्छा थी… जिसके लिए अपने अंतर्मन से बार-बार लड़ी..लड़ती रही, जिसके लिए शायद सारे जहां से जंग को तैयार बैठी थी… जिसने जिंदगी का नजरिया बदल दिया.. शूल बनकर वही अब आंखों में चुभने लगा.. शायद दर्द की इंतहा यही होती है कि दर्द की कोई इंतहा नहीं होती.. इससे ज्यादा बर्दाश्त की कोई और हद क्या होगी गर बर्दाश्त की हर हद तोड़ने को जी चाहे और मुस्कुराते हुए फिर भी आंसुओं को पीते रहे बार-बार.. बार-बार… बार-बार….

जिंदगी कई बार अनकहे सवाल छोड़ जाती है. ढ़ूंढ़ते रहते हैं हम जवाब और जाने कितने सवाल उन जवाबों की खोज में और खड़े हो जाते हैं. पर जवाब ढ़ूंढ़ना छोड़ते कहां हैं हम…जवाबों की आस में जाने कितने समंदर के गोते लगा आते हैं पर मोती की तरह सवालों के जवाब भी जिंदगी के समंदर में कहीं दबे ही रह जाते हैं.. आंसू की शख्शियत से आंखों का रिश्ता बड़ा पुराना है दोस्तों पर दोनों ही भटके राही हैं.. न आंखें किसी एक मंजर पर ठहरती हैं न आंसू किसी एक के लिए कोरों पर लुढ़कती है… जवाब ढूढ़ने की जंग में सवालों का दायरा बढ़ रहा है.. और बढ़ रही जवाब पाने की जद्दोजहद…

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